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हताशा की प्रवृत्ति का शिकार हो रहे युवा।

श्रीन्यूज़.कॉम।लखनऊ। बड़े-बड़े सपने लेकर जिंदगी की शुरुआत करने वाले युवा जब हकीकत की बेरहम जमीन पर खुद को असुरक्षित महसूस करता है तो उसके अंदर हताशा घर करने लगती है। हताशा की ऐसी ही कई स्वनिर्मित वजहों के चलते प्रदेश में बड़ी संख्या में युवा हताशा की प्रवृत्ति का शिकार हो रहे हैं। यह हताशा उन्हें नशे की लत में धकेलने से लेकर जिंदगी से मोहभंग तक खींच ले जा रही है। उत्तर प्रदेश स्टेट मेंटल हेल्थ सर्वे रिपोर्ट में ऐसा ही एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। सैंपल सर्वे के आधार पर तैयार रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रदेश के 20 लाख से ज्यादा कामकाजी युवाओं में जिंदगी जीने का हौसला घट गया है। यह संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है।
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में आयोजित तीन दिवसीय भारतीय साइकियाट्रिक सोसाइटी सेंट्रल जोन के वार्षिक अधिवेशन में इस रिपोर्ट पर चर्चा की गई। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि प्रदेश के 1.95 करोड़ लोग किसी न किसी तरह की मानसिक बीमारी का शिकार हैं। इस संख्या में भी लगातार इजाफा हो रहा है।
यहां बताया गया कि सर्वे रिपोर्ट उत्तर प्रदेश मेंटल हेल्थ अथॉरिटी को सौंप दी गई है। यह रिपोर्ट प्रदेश के कुछ जिलों में सैम्पल सर्वे के आधार पर तैयार की गई है। संगठन के सेंट्रल जोन के नवनियुक्त चेयरमैन डॉ. रवि कुमार के मुताबिक रिपोर्ट भयावह स्थित दर्शाती है। ओपीडी में आने वाले लगभग 95 फीसदी मरीज डिप्रेशन के किसी न किसी स्टेज में हैं। यह समस्या शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में बढ़ रही है, लेकिन शहरी क्षेत्रों में कुछ अधिक है। युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी, किसी न किसी तरह के नशे की प्रवृति के चलते डिप्रेशन के साथ ही मूड डिसआर्डर जैसी गम्भीर बीमारियां बढ़ा रही हैं।

हताश होंने के पांच कारण

अपेक्षा के अनुरूप नौकरी या काम न मिलना
निजी और सरकारी दोनों में ही असुरक्षा की भावना
जरा-सी विपरीत स्थिति में नशे की गिरफ्त में आ जाना
बड़े-बड़े सपने देखना और हकीकत का विपरीत होना
ये उपाय बचा सकते हैं आपको
तनाव महसूस हो तो व्यायाम और योग करें
अपने संसाधन और क्षमता के अनुरूप ही काम करें
सकारात्मक विचारों से बेहतरी की उम्मीद बढ़ाएं
जहां भी अच्छे काम हो रहे हों वहां जरूर जाएं
बिना लापरवाही मनोचिकित्सक की सलाह लें
सरकार से अपेक्षाएं
जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम को मजबूत करने के साथ प्राइमरी हेल्थ सेंटर और कम्युनिटी हेल्थ सेंटर पर मनोविशेषज्ञों की तैनाती व दवाओं का समुचित प्रबंध किया जाना चाहिए। पुणे से आए बिग्रेडियर डॉ. एमएसवीके राजू के मुताबिक एमबीबीएस पाठ्यक्रमों में मनोरोग विषय शामिल किया जाना चाहिए। एमडी की सीटें देश के मेडिकल कॉलेजों में बढ़ें।

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