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पाकिस्तान बनाने में सबसे आगे रहे ये सात लोग कौन थे और क्या करते थे?

पाकिस्तान आज अपनी आजादी की 71वीं सालगिरह मना रहा है। पाकिस्तान का नाम सुनते ही अधिकांश भारतीयों के मन में दुश्मनी का भाव पैदा हो जाता है। तो वहीं कुछ अति उदारवादी, भावनाओं को तथ्यों से ज्यादा महत्व देने वाले भी, पाकिस्तान की सांस्कृतिक समृद्धि का बखान करते नहीं थकते। पर असली पाकिस्तान इन दोनों छवियों के बीच कहीं है। पाकिस्तान के बारे में कुछ विरोधाभास तो ऐसे हैं, जिन पर यकीन करना भी नामुमकिन हो जाता है। पाकिस्तान की हालांकि भारत से तुलना आज भी बेईमानी ही लगती है। हां पर पाकिस्तान ने ऐसा कोई भी कोशिश छोड़ नहीं रखी है जो तकनीकी और वैज्ञानिक प्रयोगों के स्तर पर भारत से कम हो। इसलिए आज तक अपने लिए स्थिर सरकार और स्थाई लोगतंत्र ना हासिल कर पाने वाले पाकिस्तान ने भी हमारे परमाणु शक्ति सम्पन्न होने के बाद एड़ी-चोटी का जोर लगाकर अपने लिए परमाणु शक्ति हासिल कर ली। पाकिस्तान कई बार भारतीय मिसाइलों के प्रयोग के बाद अपनी उसी रेंज और क्षमता की मिसाइल का परीक्षण कर ऐसा ही कुछ संदेश देना चाहता है।

पाकिस्तान में लोगोॉ के पास भले ही नागरिक अधिकार ना हों पर अमेरिका और चीन का मार्केट जरूर वहां है, जिसके साथ सेना मिलकर पाकिस्तान का शासन चला रही है। जिस पाकिस्तान को आज हम देखते हैं उसके निर्माण के लिए विचार बनने की प्रक्रिया करीब-करीब एक सदी तक चली थी और आज जो भी प्रवृत्तियां पाकिस्तान के असफल राष्ट्र होने की गवाही देती हैं उनकी जड़ भी पाकिस्तान के बनने के इस करीब-करीब सौ साल के इतिहास में गुंथी हुई है। हम इस पाकिस्तान के निर्माण और दुनिया के सबसे बड़े विभाजन और अद्वितीय त्रासदी से जुड़ी कुछ कहानियां आप लोगों तक पहुंचाने का प्रयास इसे समझने के लिए कर रहे है। आप पढ़ें, इस त्रासदी के कुछ अनछुए पहलुओं का अवलोकन करें और पसंद आए तो दूसरों को भी इस सीरीज के बारे में खुलकर बताएं।

शुरुआत में मुस्लिम लीग, पाकिस्तान को भारत से अलग राज्य बनाने की बजाए भारत का ही एक राज्य बनाना चाहती थी

हालांकि पाकिस्तान के निर्माण की प्रक्रिया 1906 में मुस्लिम लीग के गठन के बाद से तेज हुई पर दो अलग-अलग राष्ट्रों का सिद्धांत अभी भी नेताओं के मन में नहीं था। पर 1930 से 1940 के बीच दो राष्ट्र के सिद्धांत की सोच को तेजी से लोगों के मन में जगह मिली और कहा गया कि हिंदूओं और मुस्लिमों की संस्कृति एक-दूसरे से इतनी अलग है कि दोनों एक ही देश में नहीं रह सकते। इस विचार को पहली बार 1930 में मुस्लिम लीग के इलाहाबाद अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए महान उर्दू कवि इकबाल ने रखा। उनका कहना था, उत्तर-पश्चिम भारत का संगठित मुस्लिम राज्य के रुप में निर्माण ही मुझे मुसलमानों की अंतिम नियति प्रतीत होती है। इसीलिए कभी भारत की शान में ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ रचने वाले उर्दू कवि इकबाल को पाकिस्तान के विचार का जनक कहा जाता है।

फिर भी कई इतिहासकारों का मानना है कि इकबाल के दिए भाषण को पूरा सुनने पर पता चलता है कि इस महान उर्दू कवि और देशभक्त का सपना देश को विभाजित करने का नहीं था बल्कि पश्चिमोत्तर भारत के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों का पुनर्गठन करके उसे एक ढीले-ढाले भारतीय संघ में एक स्वायत्त इकाई बनाना था। पाकिस्तान नाम सर्वप्रथम कैंब्रिज (इंग्लैंड) विश्वविद्यालय के छात्र चौधरी रहमत अली ने 1933 में दिया। चौधरी रहमत अली ने एक पर्चा जारी कर पृथक राज्य पाकिस्तान की परिकल्पना को जन्म दिया। रहमत अली ने पंजाब ,अफगान प्रांत, कश्मीर ,सिंध के प्रथम अक्षर और बलूचिस्तान से अंतिम शब्द लेकर पाकिस्तान शब्द का निर्माण किया 1933 और 1935 में लिखे गए दो पर्चो में रहमत अली ने एक नई अस्मिता के लिए अलग राष्ट्रीय दर्जे की मांग की थी, जिसे उसने पाकिस्तान नाम दिया।

22-23 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग का अधिवेशन लाहौर में हुआ। इसकी अध्यक्षता मोहम्मद अली जिन्ना ने की।
इस अधिवेशन में भारत से अलग एक मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान की मांग की गई। लाहौर अधिवेशन(1940) में पहली बार पृथक पाकिस्तान राज्य के निर्माण का प्रस्ताव पारित किया गया। मोहम्मद अली जिन्ना ने अधिवेशन में भाषण देते हुए कहा कि वह एक अलग मुस्लिम राष्ट्र के अतिरिक्त और कुछ स्वीकार नहीं करेंगे। वह अंत तक अपने निर्णय पर अटल रहेंगे जब तक कि पाकिस्तान के निर्माण की मांग को पूर्णता स्वीकार नहीं कर लिया जाएगा। 23 मार्च 1940 के प्रसिद्ध प्रस्ताव का प्रारूप सिकंदर हयात खान ने बनाया और उसे फजलुल हक ने प्रस्तुत किया। खलीकुज्जमॉ ने पृथक पाकिस्तान प्रस्ताव का समर्थन किया लेकिन प्रस्ताव में पाकिस्तान शब्द का जिक्र नहीं था। मोहम्मद अली जिन्ना ने दो राष्ट्र के सिद्धांत का प्रतिपादन किया।

पर पाकिस्तान के विचार की शुरुआत करने और उसे शुरुआती दौर में पोसने में अलीगढ़ आंदोलन का जो रोल रहा उसे दरकिनार नहीं किया जा सकता। ऐसे में पाकिस्तान की आजादी के बरसी पर आपको इस लेख की अगली कड़ी में जानने को मिलेगा कि सर सैयद अहमद खां का पाकिस्तान के बनने में क्या रोल था और उनके चलाए ‘अलीगढ़ आंदोलन’ ने पाकिस्तान के बनने की प्रक्रिया को कैसे प्रभावित किया?

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