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दुनिया का सबसे महान स्वतंत्रता आंदोलन जिस तकनीक से लड़ा गया, क्या वो गांधी ने उधार ली थी?

साल 1998. इस साल एक फिल्म आई थी दिल से. फिल्म के निर्देशक थे मणिरत्नम और इसके लिए गीत लिखे थे गुलजार ने. फिल्म कई दिनों तक सिनेमाघरों की सिल्वर स्क्रीन पर चढ़ी रही. फिल्म के गाने भी बहुत पसंद किए गए. किए भी क्यों न जाते? गानों का म्यूजिक दिया था रोजा से डेब्यू करने वाले और एक साल पहले ‘मां तुझे सलाम, वंदे… मातरम्….’ गाना रचकर ‘देशभक्ति 2.0’ देश में जगाने वाले ए आर रहमान ने. रहमान इस फिल्म से हिंदी कंपोजरों की जमात में शिखर पर पहुंच गए. खैर विषयांतर न हो इसलिए फिर से फिल्म की ओर लौटते हैं. फिल्म 1992 में हुए घटी घटनाओं के जरिए भारतीयों में पल रहे सांप्रदायिक दानव का पर्दाफाश करती थी. यानी फिल्म का विषय था, सांप्रदायिकता.

इस मामले में 1998 एक महत्वपूर्ण साल था क्योंकि यही साल था जब देश एक और घटना की 50वीं बरसी मना रहा था. एक ऐसी घटना जिसमें सिर्फ तीन गोलियां चली थीं पर एक आदमी में जा धंसी उन तीन गोलियों ने निर्धारित कर दिया था कि 50 साल बाद हमें “दिल से” जैसी फिल्म देखने को मिलेगी. ये घटना थी महात्मा गांधी की हत्या. उसी सांप्रदायिकता का प्रतिफल, जिसका प्रतिफल ये फिल्म थी. खैर हमने यानी भारत ने जो बोया वही काटा.

पर कौन था ये महात्मा, जिसकी यादें 1998 में पचास साल बाद भी पीछा नहीं छोड़ रही थीं और आज भी नहीं छोड़ती हैं. इसी फिल्म में लिखे गुलजार के गीत ‘तू ही तू सतरंगी रे…’ से बोल उधार लें तो कह सकते हैं कि ये महात्मा वो इंसान था जिसने शायद भारत से मरते-मरते भी कहा होगा, ‘मुझे मौत की गोद में सोने दे, तेरी रूह में जिस्म डबोने दे…’ और निसंदेह उस महबूब भारत के मिजाज की उसे अद्वितीय समझ थी. तभी तो तब का उसका भारत की रूह में डबोया जिस्म आज आज़ादी के 70 साल होने के बाद भी वैसा ही संरक्षित है. आखिर तभी तो कभी नोट पर. कभी स्वच्छता अभियानों पर. और कभी मनरेगा जैसे तमाम कार्यक्रमों के जरिए रह-रह कर कभी चेहरे, कभी चश्में, कभी लाठी और कभी चरखे के रुप में उभरता रहता है.

एक साधारण कठियावड़ी परिवार में जन्मा एक शख्स जिसका जन्म और रहन-सहन बेहद ही साधारण से माहौल में हुआ. आगे चल कर न सिर्फ देश के लिए प्रेरणा बना बल्कि दुनिया में भारत का सिर गौरव से ऊंचा किया. इस स्वतंत्रता दिवस पर बात करते हैं मोहनदास करमचंद गांधी यानि महात्मा गांधी की जिंदगी के उस पहलू की जिसके कारण उन्हें हमेशा याद किया जाएगा. अहिंसा और शांति.

‘वॉर एंड पीस’ और ‘अन्ना करेनीना’ की रचना करने वाले रूस के महान साहित्यकार लियो टॉल्स्टॉय को कौन नहीं जानता. गांधी और टॉल्स्टॉय के बीच काफी गहरा नाता था. नाता विचारों का, शिक्षा का और सीख का. अगर गोपाल कृष्ण गोखले गांधी के राजनीतिक गुरु थे तो टॉल्स्टॉय आध्यात्मिक. गांधी ने टॉल्स्टॉय के विचारों को अपनी जिंदगी में उतार लिया. हालांकि बापू और टॉल्स्टॉय की कभी मुलाकात नहीं हुई इसके बावजूद भी ये दोनों इतने समान थे की ये बिना मिले ही करीब आ गए. इन दोनों के बीच खतों का रिश्ता था.

शांति और अहिंसा सबसे पहले टॉल्स्टॉय द्वारा अपनाया हुआ अस्त्र था. उन्होंने एक समय यूरोप में चल रहे रक्तपात को रोकने के लिए अहिंसा को एक अस्त्र के तौर पर इस्तेमाल किया जिसका परिणाम वही हुआ जिसकी उम्मीद थी. जिस समय गांधी साउथ अफ्रीका में रह कर वकालत के साथ-साथ अपने सहयोगियों हेनरी पोलक, थंबी नायडू, पारसी रुस्तमजी आदि के साथ अपने आंदोलन की शुरुआत कर चुके थे उसी समय उन्होंने टॉल्स्टॉय को अपना पहला खत लिखा. गांधी ने ये खत लिखने से पहले टॉल्स्टॉय की किताब ‘ईश्वर की सत्ता तुम्हारे अंदर ही है’ पढ़ी थी. इससे वो खासे प्रभावित हुए. गांधी ने इस खत में टॉल्स्टॉय से अपने सविनय अवज्ञा आंदोलन का ज़िक्र किया जो एक तरह से उन्हीं की विचारधारा से प्रभावित था.

ऐसा हम अक्सर देखते हैं कि इंसान को किताबी बातें अपनी जिंदगी में उतारने में काफी कठिनाई होती है लेकिन गांधी ने न सिर्फ टॉल्स्टॉय की जिंदगी से प्रेरणा ली बल्कि उनकी किताबी बातों को बखूबी अपनी जिंदगी में उतारा भी. टॉल्स्टॉय को इस खत की न सिर्फ बेहद खुशी हुई बल्कि उन्होंने अपनी डायरी में भी इसका ज़िक्र किया. जिस समय दोनों के बीच विचारों की गर्माहट आपसी रिश्ते की वजह से बाद रही थी, उसी समय टॉल्स्टॉय का खून ठंडा पड़ता जा रहा है. गांधी ने अपने दूसरे खत के साथ दक्षिण अफ्रीका से भारत यात्रा के बीच लिखी गयी अपनी किताब ‘हिन्द स्वराज’ भेजी. टॉल्स्टॉय ने अपनी डायरी में इस पत्र और किताब का ज़िक्र भी किया ये उस समय की बात है जब उनकी जिंदगी के चंद दिन ही शेष बचे थे.

4 अप्रैल 1910 के गांधी के खत का जवाब उन्होंने 24 अप्रैल 1910 को दिया. धीरे धीरे दोनों के बीच काफी ज़्यादा करीबी दिखने लगी. टॉल्स्टॉय गांधी के खत मिलने पर उसका जिक्र अपनी डायरी में करते. गांधी उन्हें अपने कामों की जानकारी देते. ये उनके लिए काफी दिलचस्प बात होती क्योंकि वो अपने विचारों को काम की शक्ल में होता देख रहे थे. टॉल्स्टॉय ने अपनी मौत से करीब 2 महीने पहले गांधी को अपना तब तक का सबसे बड़ा खत लिखा. इसमें उन्होंने सत्याग्रह के परिणामों और उससे जुड़ी बातों का ज़िक्र किया. इसके कुछ समय बाद ही टॉल्स्टॉय हमेशा के लिए सो गए.

टॉल्स्टॉय का शरीर तो 20 नवंबर 1910 में खत्म हो गया लेकिन उनकी आत्मा यानि उनके विचारों को जिंदा रखा बापू ने. गांधी ने उनके जीवन से ली हुई एक-एक सीख को एक धागे में पिरो कर उसकी माला बना कर पहन लिया. ऐसा इतिहास में शायद पहली बार हुआ था जब लोग किताबों में लिखी हुई बातों को असल जिंदगी में उतरते हुए देख रह थे. ऐसा अक्सर देखा जाता है कि किसी की फ़िलॉसफी इसी दूसरे को प्रभावित तो करती है लेकिन उसे महज किताबी ज्ञान समझकर उसे वैसे का वैसा ही छोड़ देते हैं. लेकिन महात्मा गांधी ने न सिर्फ टॉल्स्टॉय के विचारों को मूर्त रूप दिया बल्कि उसका बेहतरीन उदाहरण पूरी दुनिया के सामने रखा जिसके लिए आज भी उन्हें पहचाना जाता है.

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