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क्या गांधी जादूगर थे और उनके पास हैरी पॉटर वाली छड़ी थी?

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर बात करते हैं गाँधी की जिंदगी के उस पड़ाव पर जहां से दुनिया और भारत में परिवर्तन होना शुरू हुआ और गाँधी की पहचान शून्य से शिखर तक पहुँच गयी. यूँ तो गाँधी विदेश में थे लेकिन वो भारत की आज़ादी के लिए इतने व्याकुल थे कि उन्होंने वहां से वापस आने के हर संभव प्रयास कर डाले. गाँधी दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के हक़ की आवाज़ उठा रहे थे लेकिन इसके बावजूद वो अतृप्त थे. क्योंकि उनके द्वार चलाये जा रहे आंदोलनों का पैमाना काफी छोटा था. अपने देश को गुलामी की जंजीरो में बांध देख कर वे काफी असहज महसूस करने लगे थे.  दक्षिण अफ्रीका में गाँधी गए तो वकालत करने थे लेकिन परिस्थितियां ऐसी पैदा हो गयी की उन्हे वहाँ 21 साल तक भारतीयों के साथ हो रहे रंगभेद के लिए फिरंगियों से लोहा लेना पड़ा. गाँधी के पास ऐसे कई मौके आए जब वे सब कुछ छोड़कर भारत आ सकते थे. गाँधी इसके लिए अपना मन भी पक्का कर चुके थे. इसके लिए वो 1901 में अपने परिवार के साथ डरबन से निकले भी लेकिन उस आंदोलन को पूरा करना उनका कर्तव्य था इसलिए दक्षिण अफ्रीका में शुरू किये गए अपने आंदोलन के काम के लिए उन्हें वापस आना पड़ा. तब भी गाँधी ये सोच कर गए थे कि वो अपनी ओर से देरी नहीं करेंगे और जितनी जल्दी हो सकेगा लौट आएंगे.

अपनी इसी कोशिश को आगे बढ़ने के लिए गाँधी ने 1904 में मिलनर के पास एक प्रस्ताव भी भेजा जिसमें गोरों और अश्वेतों के बीच समझौते की बात कही गयी थी. अगर ये प्रस्ताव अपना लिया जाता तो गाँधी का कस्तूरबा और अपने परिवार के पास जाकर बम्बई हाईकोर्ट में वकालत कर सकते थे. लेकिन ऐसा हो नहीं सका इसलिए गाँधी ने अपने परिवार को ही अपने पास साउथ अफ्रीका में बुला लिया. इसके बाद 1906 और 1909 में भी गाँधी ने अपने आंदोलन के कामों को पूरा करने के लिए लन्दन तक यात्रा की लेकिन फिर भी उनकी वतन वापसी का उद्देश्य पूरा नहीं हो सका. इसके बावजूद भी बापू ने अपने प्रयासों को जारी रखा. 1911 में भी बापू को ये आशा रही कि जनरल स्मट्स उनकी मुख्य मांगों को मान लेंगे लेकिन तब भी ऐसा नहीं हुआ. इतनी मेहनत और दौड़ धूप करने के बाद बापू ने नया सत्याग्रह आंदोलन करने की ठान ली. इसका परिणाम ये हुआ कि एक आखिरी समझौता कानून की शक्ल में तब्दील होने की परिस्थितियां बनने लगीं. दक्षिण अफ्रीका में गाँधी सिर्फ एक समस्या को सुलझाने के लिए आए थे जिसके कारण उन्हें दो दशकों तक वहीं रहना पड़ा. आखिरकार फरवरी 1914 के आखिरी सप्ताह में गाँधी ने अपने राजनीतिक गुरू गोपाल कृष्ण गोखले को लिखा कि वह भारत लौटना चाहते हैं. गोखले ने उनकी बात को स्वीकार तो कर लिया लेकिन उन्होंने गाँधी को भारत के राजनीतिक मसलों से दूर रहने के लिए कहा.

9 जनवरी 1915 इतिहास के पन्नों में दर्ज़ वो दिन जिस दिन महात्मा गाँधी वतन वापस लौटे. पहले मोहनिया फिर मोहन, इसके बाद मोहनदास और फिर महात्मा. मोहनिया से लेकर महात्मा बनने तक के सफर में गाँधी ने भारत के उस चेहरे को देखा जिससे वो बिल्कुल अंजान थे. अपने गुरू के कहने पर गाँधी भारत भ्रमण पर निकले. भारत की नब्ज़ को सही तरीके से पकड़ने के लिए गाँधी ने ट्रेन के तीसरे दर्जे के डिब्बे में सफर किया. जिस समय गाँधी भारत आए उस समय आजादी के आंदोलन और कांग्रेस में डॉक्टरों, वकीलों जैसे ऊंचे दर्जे के लोग थे. लेकिन गाँधी ने आम लोगों को इस आंदोलन से जोड़ा. जब गाँधी ने अपने सफर की शुरुआत की तो देश के राजनीतिक वातावरण में मौजूद नरमपंथी और गरमपंथी दोनों ही को उनका तरीका समझ नहीं आया. जहाँ एक ओर नरमपंथी लोग स्वाभाव में कुछ ज़्यादा ही विनम्र थे तो वहीं गरमपंथी गाँधी जैसे ही कदम उठाते लेकिन हिंसक रूप में. गाँधी ने शुरुआत से ही अपने लक्ष्यों को सीमित रखा. 15 अप्रैल,1917 को राजकुमार शुक्ल गाँधी को नील किसानों की दुरवस्था दिखाने के लिए चंपारण ले गए. गाँधी के चंपारण पहुंचने से पहले ही उनकी कीर्ति वहां पहुंच चुकी थी. 1917 में शुरू हुआ चंपारण सत्याग्रह न सिर्फ भारतीय इतिहास बल्कि विश्व इतिहास की एक ऐसी घटना है, जिसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद को खुली चुनौती दी थी.

गाँधी अपने एक-एक कदम को सोच समझकर रख रहे थे जिससे सफल आंदोलन के लिए उनके कदम जमीन में गढ़े रहें. उनके इन्हीं प्रयासों के कारण कांग्रेस समेत पूरे देश को जमीनी स्तर का नेता मिला. कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी में निचले तबके तक की खबर लेने और उसे  मिला-जुला कर चलने के रवैय्ये के कारण लोगों ने उन्हें अपनाया. जिस समय नेहरू का उदय हो रहा था गाँधी ने ऐसे समय में खुद को अबुल कलम आज़ाद, मोतीलाल नेहरू, मदन मोहन मालवीय, पंडित गोपाल वल्लभ पन्त और मोहम्मद अली जिन्ना ऐसे लोगों के बीच खुद को स्थापित किया. इसका नेहरू पर गहरा प्रभाव पड़ा. गाँधी जनांदोलन में मतभेदों वाले लोगों को शामिल कर उन्हें राज़ी कर एक मत पर लाने वाले इंसान थे. जिन्होंने अलग अलग विचारों और कार्यक्रमों के साथ बखूबी सामंजस्य बिठाया. जनांदोलन कर मजदूरों किसानों को कांग्रेस में जोड़ा.

1919 तक बारडोली, खेड़ा और चंपारण सत्याग्रह सफल हो चुके थे. इसके सफल होने के बाद गाँधी महात्मा गाँधी हो गए. तब तक गाँधी भी उस मक़ाम तक पहुँच चुके थे जहां से वो अपने अगले आंदोलन को शुरू कर सकते थे. गाँधी ने 1921 में असहयोग आंदोलन शुरू किया. हालाँकि असहयोग आंदोलन पहले भी हुआ था लेकिन गरमपंथी इसका विरोध होने पर हिंसक हो जाते थे. गाँधी ने इसे अहिंसा के नारे के साथ शुरू किया.

असहयोग आन्दोलन पूरे चरम पर था, तभी गोरखपुर के निकट चौरी-चौरा नामक स्थान पर आन्दोलनकारियों ने एक थानेदार और 21 सिपाहियों को जला कर मार डाला. असहयोग आन्दोलन हिंसात्मक रूप धारण करने लगा. इससे गाँधीजी बहुत विचलित हो उठे. उन्हें लगा कि लोग निश्चित ही अभी तक सत्याग्रह के लिए तैयार नहीं हुए हैं. तब गाँधीजी ने इसको स्थगित करने की घोषणा की जिससे बहुत से नेता गाँधी जी से रुष्ट भी हुए. इतना ही नहीं गांधी ने खिलाफत आंदोलन से जुड़कर मुसलमानों को कांग्रेस के साथ जोड़ने का काम किया. ऐसा 1887 के बाद पहली बार मुसलमान इतने बड़े स्तर पर आज़ादी की लड़ाई में आगे आए.

असहयोग आन्दोलन के स्थगन पर मोतीलाल नेहरू ने कहा कि, “यदि कन्याकुमारी के एक गाँव ने अहिंसा का पालन नहीं किया, तो इसकी सज़ा हिमालय के एक गाँव को क्यों मिलनी चाहिए.” अपनी प्रतिक्रिया में सुभाषचन्द्र बोस ने कहा, “ठीक इस समय, जबकि जनता का उत्साह चरमोत्कर्ष पर था, वापस लौटने का आदेश देना राष्ट्रीय दुर्भाग्य से कम नहीं”. आन्दोलन के स्थगित करने का प्रभाव गांधी जी की लोकप्रियता पर पड़ा. 13 मार्च, 1922 को गांधी जी को गिरफ़्तार किया गया तथा न्यायाधीश ब्रूम फ़ील्ड ने गांधी जी को असंतोष भड़काने के अपराध में 6 वर्ष की क़ैद की सज़ा सुनाई. स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणों से उन्हें 5 फ़रवरी, 1924 को रिहा कर दिया गया.

उस दौर के गाँधी के बारे में जाने माने इतिहासकार शहीद अमीन लिखते हैं-

“अपने अनपढ़ भक्तों के महात्मा वैसे नहीं थे जैसे वे सचमुच, बल्कि वैसे थे जैसी उन्होंने कल्पना की थी.“ उनकी कल्पना में वास्तविक गाँधी और उनका अहिंसक असहयोग कार्यक्रम अक्सर खो जाते थे. कल्पनाओं के गाँधी असाधारण रहस्यमयी शक्तियों से लैस थे: किसान उनको ऐसा संत समझते थे जो रोगों को दूर कर सकता था, अपना अनुकरण करने वालों को पुरस्कार देता था और अपनी सत्ता की अवज्ञा करने वाले को दंड देता था. बंगाल के आदिवासियों प्रचलित अफवाहों से गाँधी की सुरक्षादायक शक्ति में उनकी परम आस्था का पता चलता था: वे समझते थे की वे अगर गाँधी टोपी पहनेंगे और गाँधी का नाम लेंगे तो पुलिस की गोलियां उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकेंगी. इससे उनके भय की दीवार ढह गयी और उनकी ऊर्जा अभूतपूर्व जन-कार्यवाइयों के रूप में फूट पड़ी. गाँधी का नाम जपते हुए किसानों ने उन कार्यवाइयों में भाग लिया, जो आसानी से गांधीवादी आदर्शों की दहलीज़ के पार चली जाती थीं. बंगाल के आदिवासी किसानों ने बाज़ार और मछलियों के तालाब लूटे और जंगल कानूनों को तोड़ा, कैदियों ने जेल के दरवाजे तोड़ दिये. उत्तरी बिहार में निचली जातियों के गरीब किसान सबसे जुझारू लोग थे; उनकी सहस्त्राब्दिक आशाओं ने बाज़ार लूटने की अनेक घटनाओं को जन्म दिया, उपनिवेशी सत्ता को इससे अभूतपूर्व चुनौती मिली और पुलिस की कार्यवाई का साहस से सामना किया गया. इसलिए चौरीचौरा (गोरखपुर) के किसानों ने जब स्थानीय थाने पर हमला करके 22 पुलिस वालों को ज़िंदा जला दिया, तब गाँधी के पास आंदोलन को वापस लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था, क्योंकि तब तक ये स्पष्ट रूप से उनके नियंत्रण के बाहर जा चुका था.

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