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क्या ? राजनीतिक आकाओं को खुश करने के चक्कर में ढाई दर्जन लोगों की बलि चढ़ा दी गई।

श्री न्यूज़।लखनऊ। NTPC ऊंचाहार स्थित ऊर्जा उत्पादन संयंत्र के बॉयलर फटने के बाद अब राजनितिक गलियारो में चर्चाओ का बाजार तेज हो गया है। आरोप प्रत्यारोप लगने शुरू हो गये हैं।NTPC ऊंचाहार स्थित ऊर्जा उत्पादन संयंत्र के बॉयलर फटने के बाद हवा में जो राख का ढेर उड़ा था वह 500 डिग्री सेंटीग्रेड तक गर्म होने की वजह से इंसानों को भून देने वाला था। सत्ता में बैठे राजनीतिक आकाओं को खुश करने के चक्कर में ढाई दर्जन लोगों की बलि चढ़ा दी गई। यही नहीं, इतने बड़े हादसे की जांच के नाम पर भी लीपा -पोती की तैयारी भी शुरू है।एनटीपीसी खुद ही अपनी जांच करेगा। इस जांच को लेकर अभी से सवाल उठने लगे हैं। परियोजना से जुड़े लोग ही दबी जुबान में कह रहे हैं कि ‘बड़ों’ को बचाने की साज़िश रच दी गई है। नीचे के अधिकारियों और ठेकेदारों को बलि का बकरा बनाकर पूरे मामले को रफा-दफा करने की तैयारी भी चल रही है।ऊंचाहार परियोजना में कम से कम वक्त में 500 मेगावाट की इकाई स्थापित करके वाह वाही लूटने की एनटीपीसी शीर्ष प्रबंधन की जिद ने तमाम जिंदगियों को निगल लिया। विशेषज्ञ की मानें तो 500 मेगावाट क्षमता की जिस छह नंबर इकाई पर हादसा हुआ, वहां उस समय 250-300 मजदूर काम कर रहे थे। छह नंबर इकाई का काम पूरा हो जाने के एनटीपीसी प्रबंधन के दावे को सही माना जाए तो एक बड़ा सवाल यह है कि फिर इतने मजदूर काम पर क्यों लगाए गए थे? परियोजना से जुड़े सूत्रों के मुताबिक बॉयलर पर इंसुलेशन की रबर लगवाई जा रही थी। चलते हुए बॉयलर पर इंसुलेटर लगवाना भी सुरक्षा में एक बड़ी चूक मानी जा रही है। विशेषज्ञों की मानें तो इंसुलेटर का काम पूरा हुए बिना बॉयलर को चलाया ही नहीं जाना चाहिए क्योंकि इससे दुर्घटना की आशंका बनी रहती है।तकनीकी जानकारों के अनुसार फर्नेश का प्रेशर माइनस 5 से प्लस 5 एमएमडब्ल्यूएच (दबाव मापने की इकाई) के बीच होना चाहिए जो 350 एमएमडब्ल्यूएच तक पहुंच गया था। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी दशा में बॉयलर का प्रेशर माइनस में ही होना चाहिए था। सुरक्षा मानकों के लिहाज से इसकी भी अनदेखी की गई।जानकारों की मानें तो हादसे से तीन दिन पहले ही इसके संकेत मिलने लगे थे। छह नबंर इकाई में जो कोयला फीड किया जा रहा था, उसका कुछ हिस्सा बॉयलर की दीवारों पर जमने लगा था। तीन दिन से बॉयलर की दीवारों पर क्लींकर (ढेला) बनने लगा था। बॉयलर को चलाने के लिए इन क्लींकरों को तोड़ना पड़ता है। यही नहीं, ऐश डक्ट हॉपर (राख एकत्र करने की जगह) क्षमता से 15 मीटर ज्यादा भर गयी थी इससे बॉयलर में प्रेशर बन रहा था। बिजली की मांग नहीं, फिर भी चलाई जा रही थी इकाई जानकारों का कहना है कि बॉयलर में क्लींकर बनने और ऐश डक्ट हॉपर के क्षमता से ज्यादा भरे होने के बावजूद छह नंबर इकाई को 200 मेगावाट क्षमता पर चलाया जा रहा था। बिजली की मांग न होने के बाद भी केवल आकाओं को खुश करने के लिए इकाई को चलाया जा रहा था। मौसम बदलने की वजह से पूरे देश में बिजली का लोड कम है। ऐसे में इकाई को चलाने का कोई औचित्य भी नहीं था।सूत्रों की मानें तो एनटीपीसी शीर्ष प्रबंधन 2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर प्रधानमंत्री के हाथों इस इकाई का लोकार्पण कराकर रिकॉर्ड समय में काम पूरा कराने का श्रेय लूटने की फिराक में भी था । यही वजह है कि आधी-अधूरी तैयारियों के बीच बीते अप्रैल में इस इकाई को चालू करा दिया गया। यह इकाई इस साल के अंत तक स्थापित की जानी थी।विशेषज्ञों का कहना है कि कॉमर्शियल उत्पादन शुरू कराने के लिए अभी इस इकाई में काफी काम बचा है। कहा तो यह भी जा रहा है कि एनटीपीसी के एक बड़े अफसर ने निदेशक पद पर प्रोन्नति के लिए भी काम पूरा होने का दावा करते हुए समय से पहले इकाई को चालू करवा दी गयी ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के अध्यक्ष शैलेंद्र दुबे का कहना है कि हादसे की मुख्य वजह क्या थी, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा लेकिन पहली नज़र में देखा जाए तो सुरक्षा मानकों में चूक तो दिखाई देती ही है। बिजलीघरों में सुरक्षा मानकों से किसी तरह का समझौता नहीं होना चाहिए।

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