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राष्ट्रवाद के आईने में लोकमान्य तिलक मिथक और सच्चाई

तिलक सच्चे अर्थों में लोकमान्य थे। भारत की आधुनिक और परंपरागत ऊर्जा को एक साथ गूंथ देने वाले करिश्माई नायक। अभिजन और आमजन के बीच का सेतु। भारतीयता को विराट अर्थें से जोडऩे वाले विचारक। परंपरागत प्रतीकों, नायकों और मिथकों का प्रयोग करके स्वराज के महायज्ञ में जनऊर्जा का विराट सैलाब खड़ा कर देने वाले जननायक…. एक व्यक्ति और एक विचार के रूप में वे ब्रिटिश सत्ता के समक्ष भारतीय चेतना का ऐसा प्रकाशमान प्रतीक बनकर उभरे कि उनकी आभा को क्षीण करने के लिए भ्रामक आलोचनाओं, नफरतों और साजिशों का एक समूचा वातावरण  रचा गया, लेकिन उससे भी विडंबनापूर्ण तथ्य यह है कि भ्रमण आलोचनाओं की इस धुंध को चीरकर उनके व्यक्तित्व का उजास देखने और समझने की कोशिशें भी क्षीण होती गई…

लोकमान्य तिलक जो भारत के महान राष्ट्रवादी नेताओं में से एक हैं, वे भारत के सबसे गलत समझे गए पैगंबरों में से भी एक हैं। उनकी  जिंदगी और उनकाा काम महान विरासत से भरा हुआ है, लेकिन फिर भी उनका संदेश अस्पष्ट रह गया। वे यथार्थवादी राजनीतिज्ञ थे, लेकिन उनका दर्शन सर्वोच्च आदर्शों से संचालित था। उन्हें सांप्रदायिक कहा गया, लेकिन असल में वे उन पहले नेताओं में से थे, जिन्होंने राष्ट्रीय एकता के लिए सांप्रदायिक विभाजनों को समाप्त करने की वकालत की। उन्हें क्षेत्रीयताावादी करार दिया गया, लेकिन वे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने लोगों को देशप्रेम का मतलब समझाया। कहते हैं कि वे हिंसा में यकीन करते थे, लेकिन उन्होंने ही पहली बार अहिंसक राजनीति की अपील की। उन्हें क्रांतिकारी कहा जाता है, जो कि सच भी है, लेकिन यह याद रखते हुए कि वे सकारात्मक क्रांतिकारी थे, जो बनाने में यकीन करते थे, न कि बिगाडऩे में। उन्हें अतिवादी कहा गया, लेकिन वे नरम थे। आरोप लगाया जाता है कि वे लक्ष्य के लिए सब कुछ कुर्बान कर देने का दबाव बनाते थे, लेकिन सबसे पहले वे खुद का बलिदान देते थे। वे भारत के एक मात्र और पहले लोकमान्य थे। उनके संदेश को और राजनीतिक दर्शनशास्त्र को न केवल महाराष्ट्र और भारत में याद करने और समझे जाने की जरूरत है, बल्कि इसका पूरी दुनिया के लिए महत्व है। नहीं तो यही होगा कि हम उस विरासत को इस्तेमाल न किए जाने की वजह से गरीब ही बने रहेंगे, जो वे छोड़कर गए हैं।’

आधुनिक भारत के इतिहास में इतना विरोधाभासी चरित्र शायद ही किसी राजनेता का होगा जितना कि तिलक का था। अगर ब्रिटिश नाटककार शेक्सपीयर ने तिलक को देखा होता, तो बहुत मुमकिन है कि वह उन्हें भी अपने किसी नाटक का पात्र बनाता। विरोधाभास की शैली का इस्तेमाल करते हुए शेक्सपीयरर ने ‘रोमियो एंड जूलियट’ की रचना की थी, लेकिन भारत के कथित राष्ट्रवादियों ने तिलक के विरोधाभास चरित्र का इस्तेमाल करते हुिए संकीर्णता और नफरत से भरे अंतहीन आख्यानों की रचना की है।

अफसोस की बात ये है कि ये तिलक ही थे, जिन्होंने पहली बार देश को राष्ट्रवाद का  मतलब समझाया था। उन्हीं के दौर में और उन्हीं के प्रयासों से भारत में राष्ट्रीय भावना का विकास हुआ, लेकिन बीतते वक्त के साथ आज राष्ट्रवाद जिस संकीर्ण रूप में हमारे सामने आ खड़ा हुआ है वह न केवल तिलक के विरोध में है बल्कि तिलक के साथ एक बड़ी धोखाधड़ी का नमूना भी है।

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