कृपालु जी महाराज के निधन पर सस्पेंस

[Updated on Nov 13 2013 10:23AM]

गड़गांव (एसएनएन) जगदगुरू कृपालुजी महाराज का बीती रात गड़गांव के मेदांता अस्पताल में निधन हो गया. कृपालुजी इन दिनों मेदांता अस्पताल में भर्ती थे. बताया जाता है कि वह कुछ दिनों बीमार चल रहे थे. वह 91 साल के थे. हालांकि अस्पातल ने कृपालु के निधन पर कुछ कहने से इनकार कर दिया है. अभी उनके निधन पर सस्पेंस बना हुआ है.

कृपालु महाराज जगदगुरू कृपालु परिषद के संस्थापक संरक्षक थे. उन्होंने हिंदू धर्म की शिक्षा और योग के लिए भारत में चार और अमेरिका में एक केंद्र की स्थापना की़ थी. वाराणसी की काशी विद्धत परिषद ने श्री कृपालु महाराज को 34 साल की आयु में मकर संक्रांति 14 जनवरी 1957 को जगदगुरू की उपाधि प्रदान की थी.

कृपालुजी महाराज का जन्म प्रतापगढ़-कुंडा के एक छोटे से गांव में 1922 में हुआ था. उनका अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संत होने की कहानी बेहद रोचक है. 14 वर्ष की उम्र में ही उन्हें दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हो गई थी. उन्होंने प्रतापगढ़ और इंदौर में अपनी शिक्षा ग्रहण की.

इंदौर के महू संस्कृत कॉलेज से आचार्य की डिग्री लेने के बाद वे प्रवचन में जुट गए. चित्रकूट, महोबा, मथुरा, वृंदावन, इलाहाबाद और झाँसी में प्रवचन के मार्फत शिष्य बनाने लगे. कृपालु महाराज मुख्य रूप से राधा-कृष्ण के भक्त थे. प्रतापगढ़ में जब अपने जन्मस्थल पर उन्होंने विराट श्रीराम-जानकी मंदिर का निर्माण शुरू करवाया तब लोगों को उनके विश्व व्यापी संपर्कों के बारे में पता चला. कृपालु महाराज ने न सिर्फ मंदिर का निर्माण कराया बल्कि कई कॉलेजों की स्थापना भी कराई.

कई अस्पताल भी खोले जहां पर लोगों को मुफ्त दवा और भोजन प्रदान किया जाता है. उत्तरप्रदेश के राज्यपाल रहे विष्णुकांत शास्त्री उनके यहां नियमित रूप से आते-जाते थे. बाबा अपने कार्य को लेकर अक्सर चर्चा में रहते थे. उनके आश्रम में अक्सर भंडारा किया जाता था. जहां पर बर्तन और वस्त्र आदि भी प्रसाद के रूप में मिलते थे. उनके देश-विदेश सहित कई स्थानों पर आश्रम हैं.

कृपालु जी महाराज विशेषताएं.

1. वह पहले जगदगुरु थे जिनका कोई गुरु नहीं है और वे स्वयं ''जगदगुरुत्तम'' थे

2. वह पहले जगदगुरु थे जिन्होंने एक भी शिष्य नहीं बनाया किन्तु इनके लाखों अनुयायी थे.

3. वह पहले जगदगुरु थे जिनके जीवन काल में ही ''जगदगुरुत्तम'' उपाधि की पचासवीं वर्षगाँठ मनाई गयी हो.

4. वह पहले जगदगुरु थे जिन्होंने ज्ञान एवं भक्ति दोनों में सर्वोच्चता प्राप्त की व् दोनों का मुक्तहस्त दान किया.

5. वह पहले जगदगुरु थे जिन्होंने पुरे विश्व में राधाकृष्ण की माधुर्य भक्ति का धुंआधार प्रचार किया एवं सुमधुर राधा नाम को विश्वव्यापी बना दिया.

6. सभी महान संतों ने मन से इश्वर भक्ति की बात बताई है, जिसे ध्यान, सुमिरन, स्मरण या मेडिटेशन आदि नामों से बताया गया है. श्री कृपालु जी ने प्रथम बार इस ध्यान को ''रूप ध्यान'' नाम देकर स्पष्ट किया कि ध्यान की सार्थकता तभी है जब हम भगवान् के किसी मनोवांछित रूप का चयन करके उस रूप पर ही मन को टिकाये रहे.

6 वह पहले जगदगुरु थे जो समुद्र पार, विदेशों में प्रचारार्थ गए.

7. वह पहले जगदगुरु हैं जो 90  वर्ष की आयु में भी समस्त उपनिषदों, भागवतादि पुरानों, ब्रम्ह्सुत्र, गीता आदि प्रमाणों के नंबर इतनी तेज गति से बोलते हैं की श्रोताओं को स्वीकार करना पड़ता है की ये श्रोत्रिय ब्रम्हनिष्ठ के मूर्तिमान स्वरुप थे.

 

 

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